हैलो दोस्तो मै (ग्रूप सेक्स स्टोरीज) मै आप सभी
दोस्तो, मेरी हॉट भाभियों और सेक्सी लड़कियों को मेरा एक बार फिर से प्यार भरा नमस्ते.🙏यह कहानी मेरे चचेरे भाई की जवान रसभरी बीवी की चुदाई की है|
आप भी पढकर हमे कमेंट कर के बताए केसी लगी हमारी भाभी
यह थी सुनिता भाभी मेरे दूर के चाचा के बेटे सुरेश की पत्नी.
भाई और उसकी बीवी मेरे बगल वाले फ्लैट में रहने के लिए आये. उसकी सुन्दरता पर मैं ऐसा मोहित हुआ कि …..........
‘नमस्ते भईया!’
एक दिन एक आवाज़ मेरे कानों में पड़ी. अचानक से इस शब्द ने मेरी तंद्रा भंग कर दी.
वो आवाज ऐसी मीठी लगी कि उसके बाद मेरी रातों की नींद और दिन का चैन खत्म हो गया.
सामने एक सम्पूर्ण नारी को देखकर हृदय के किसी कोने से आकर्षित होने वाली भावनाओं की अनुभूति सी हुई।
सिर से पैर तक रतिरूपी नारी को इतने पास से देखकर कामदेव ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी।
वो दोनों नवविवाहित थे और मेरे फ्लिअत के साथ लगते एक डबल बेडरूम फ्लैट में रहने आये थे।
24 वर्षीय सुरेश और मैं वैसे तो मेरे उम्र के थे मगर उसकी शादी मुझसे पहले हो गयी थी.
इससे पहले सुरेश और सुनीता अपने पारीवारिक घर में रहते थे. उसकी नौकरी मेरे शहर में लग गयी.
मैं यहां पर पहले से ही अकेला रह रहा था तो इसी बिल्डिंग में मैंने उनको ये फ्लैट वाजिब किराये में दिलवा दिया था जो मेरे फ्लैट के एकदम साथ ही था.
पहले सुरेश और मैं ज्यादा नहीं मिलते थे क्योंकि उसके पापा मेरे सगे चाचा नहीं थे.
पर अब उसकी सुनीता को देखने के बाद तो सुरेश मुझे अपने सगे से भी अधिक प्रिय हो गया. उसकी 21 वर्षीय पत्नी का यौवन देखकर मेरे नीरस जीवन में जैसे बहार आ गयी थी.
अभी तक मैं अपने लंड को अश्लील फिल्मों और कहानियों के माध्यम से ही बहलाता आ रहा था.
सुनीता को देखने के बाद जैसे मेरे लंड को एक मंजिल मिल गयी.
वो मंजिल थी सुनीता की नयी नवेली चुत चुदाई जिसके ख्वाब मेरे लंड ने पहले दिन से ही देखने शुरू कर दिये.
फिर बस जितनी बार मौका मिला मैंने उस सुंदरी के यौवन का मूक रसास्वादन किया।
उसका सौंदर्य किसी पर्वतीय स्थल जैसा था. ना जाने क्यों नेत्र बार-बार उस सौंदर्य के उतार-चढ़ाव में भटक से रहे थे।
मैंने बहुत बारीकी से उस यौवना के यौवन का निरीक्षण किया। उसका हर अंग मादक और सम्पूर्ण था। जब वो चलती थी तो लगता था कि किसी झरने से पानी गिर रहा हो।
उसकी गांड इतनी मोटी थी कि मानो की साडी से बाहर निकल आएंगी. दोनों कुल्लो के बीच का घर्षण किसी भी नर को कामरस में सराबोर कर सकता था। न चाहते हुए भी मैं उस यौवना के सौंदर्य का उपासक सा हो गया।
धीरे-धीरे दिन गुजरते गए मगर उस यौवना का आकर्षण कब प्रेम में बन्ध गये पता भी न चला। जब कभी मुझे मौक़ा मिला, मैं उसके बाथरूम में जाकर उसके अंतःवस्त्रों को हाथ में लेकर ऐसा महसूस करता कि जैसे वो मेरे आगोश में हो।
समय सदैव एक सा नहीं रहता. इतने दिनों से उसके यौवन के रसस्वादन और दर्शन की जो कल्पनायें की थीं वो एक सब अधूरी सी छोड़कर सुरेश और सुनीता यह फ्लैट छोड़कर चले गये.
उन दोनों में मतभेद रहते थे और शायद वे अपने झगड़े को मेरे सामने उजागर करना नहीं चाहते थे ! पर
वो चली गयी लेकिन जैसे मेरी आत्मा को साथ ले गयी.
जो आकर्षण एक अरसे से दबा हुआ था वो बाहर आने को मचलने लगा। मैंने उसे व्हाट्सएप पर फॉलो करना शुरू कर दिया. उसके हर फ़ोटो को सेव करना, स्टेटस पर कमेंट देना शुरू कर दिया।
उसने मुझसे व्हाट्सएप पर बातचीत शुरू कर दी. मैंने उसे सब कुछ सच-सच बता दिया।
मेरा सच सामने आया तो उसका भी दिल खुल गया और उसने बताया कि वो भी मुझे पसंद करती थी.
उस दिन मैंने अपनी किस्मत को खूब कोसा. जिस रूप की रानी को मैं अपने इतने करीब रहते हुए चुदाई न कर सका था, मैं उस मौके से चूक गया.
काश ये हिम्मत मैं कुछ साल पहले कर पाता.
फिर इससे पहले कि मेरा प्यार परवान चढ़ता … उसके पति ने उसके फोन में मेरे मैसेज देख लिए।
उस वक्त सब कुछ ख़त्म हो गया।
मगर वो आकर्षण उसी स्तर पर था जो उससे पहली बार मिलकर उत्पन्न हुआ था।
उसको लेकर मन में न जाने कितनी बार कितने प्रकार के कामुक विचार आये और कितनी बार संयम टूटा।
बीतते वक्त के साथ अब वो एक बेहद समझदार और सुलझी हुई महिला हो चुकी थी।
मैं भी विवाहित हो चुका था किंतु मेरी पत्नी भी सूनीता के लिए मेरी लंड को तृप्त न कर पायी थी.
सुनीता के सपने उसे हमेशा से व्यथित करते थे. वो एक सिंपल और स्वतंत्र जीवन जीना चाहती थी। उसके अंदर की चाहत को मैंने कई बार महसूस किया था। उसका चुदास का ज्ञान
खुले आसमान में उड़ने की ख़्वाहिशों को दफ़न कर वो जमीं पर चलने में ही संतोष किये हुए थी.
मैंने उसे कई बार वासना के सागर में उतारने की कोशिश की मगर उसकी तैरने की क्षमता पर संदेह था मुझे.
शुरू से ही काम-वासना से पीड़ित रही है, ना जाने कितने रजवाड़े इस वासना की आग में जल गए। स्त्री अगर रतिरूप है तो वो ज्ञानपुंज भी है।
कुछ वक्त और बीत जाने के बाद आखिरकार सुनीता ने मुझे मिलने की स्वीकृति दे दी. उस वक्त मेरे मन उपवन में हर्ष के हजारों फूल खिल उठे थे. मेरे घर से उसके घर की दूरी मात्र 20 मिनट की ही थी.
मैंने शाम का खाना हल्का ही खाया ताकि स्वास्थ्य खराब ना हो। रात में सही से नींद नहीं आ रही थी. 8-9 साल पहले मिली उस नवयौवना का यौवन बार-बार नेत्रों के सामने आ रहा था।
उसके उन माँसल कुल्लो को न जाने मैंने कितनी बार कामुक कल्पनाओं में दुलारा था। उसने सुरेश के दफ्तर जाने के बाद सुबह 9 बजे बुलाया था।
उस सुबह का समय पहाड़ जैसा प्रतीत हो रहा था। 8.45 बजे उसकी कॉल आयी और मैं उस रास्ते पर निकल पड़ा जिस पर पर मैंने कई बार कल्पनाओं का सफर किया था।
दरवाजे पर पहुंचकर कांपते हाथों से डोरबेल बजाई.
जैसे ही दरवाजा खुला और सामने साक्षात रतिरूपी उस अप्सरा को साड़ी में देखा तो जैसे कामदेव ने बाणों की बरसात कर दी।
“दरवाजे से ही देख कर जाना है क्या?” उसने हँसते हुए कहा और धीरे से हाथ पकड़ कर मुझे अन्दर बुला लिया।
उस दिन पहली बार उसने मेरे शरीर को छुआ था.
मानो जिस्म में करंट सा दौड़ गया हो. अंदर आकर मैंने उसके चेहरे को देखा जिस पर एक मादक मुस्कान थी।
वो पहले से और ज्यादा सम्मोहक हो गयी थी. उसका हर अंग पहले से ज्यादा मादक और मांसल हो गया था।
समय ने उसके जिस्म में और भी अधिक सौंदर्य भर दिया था। उसने अपनी 3 साल की बेटी को दूसरे कमरे में टी.वी. चलाकर बाहर से बन्द कर दिया।
“चाय लोगे या ठंडा?” उसने तंद्रा भंग करते हुए कहा.
मैंने मुस्कराकर कर उसके होंठों की तरफ इशारा किया और वो किचन की ओर चल दी. आज भी वो माँसल कुल्लो का घर्षण वैसा ही था जो किसी भी पुरूष का पुरूषत्व हिला दे।
वो इठलाती हुई रसोई में चली गई. उसको भी अपनी कमनीय काया का ज्ञान था।
ये नजारा देखने के बाद मेरे कई सालों के संयम के बाँध की दीवारें कमजोर होकर उसके कुल्लो के घर्षण से टूट चुकी थीं।
मे भी वासना से वशीभूत होकर मैं रसोई में गया और उसके माँसल और सुपुष्ट कुल्लो को देखने लगा. उसने पीछे मुड़कर देखा और मुस्करा दी। उसने मानो मौन स्वीकृति दे दी थी.
मैंने उसके मजबूत कंधों को अपने हाथों से पकड़कर उसकी गर्दन पर चुम्बन अंकित कर दिए।
वो चुम्बनों से सिहर उठी और पलट कर मेरे सीने से चिपट गयी और सीने के बालों में उंगलियां फिराने लगी।
मेरे हाथ उसके सौंदर्य के पर्वतीय स्थलों का भ्रमण करने लगे और उसके माँसल कुल्लो को पहली बार सहलाया।
चाय और कामुकता दोनों ही उफान पर थे. अब या तो चाय पीनी थी या यौवनरस।
कामुकता ने यौवनरस चुना और मैं सुनीता को उठाकर बेडरूम में ले आया.
उसकी आंखों में वासना और प्यास के डोरे तैर रहे थे।
उसकी साड़ी को उसके कसक जिस्म के आगोश से मैंने अलग किया.
उसने दोनों हाथों से अपने रसभरे चुचो को छुपा लिया।
मैंने धीरे से सुनीता की गर्दन के पीछे और नग्न क़मर को चूमा तो उसके माँसल कुल्लो में एक कंपन सा हुआ और उसके मुंह से एक सीत्कार सी निकली।
जब वो दोनों हाथों से चुचो को छुपा रही थी तो मैंने चुपके से उसके पेटीकोट का नाड़ा खोल दिया.
जब तक वो पेटीकोट पकड़ती वो उसके पैरों में गिर चुका था।
पहली बार उसके कुल्लो को इतने करीब से देखकर मेरी हालत खराब हो रही थी. उसके माँसल कुल्लो मेरी कामुक कल्पनाओं से भी कामुक थे।
मैंने धीरे से उसके कुल्लो को दोनों हाथों से छुआ.
मुझे अहसास हुआ कि उसके कुल्ले कितने कोमल और माँसल हैं। उसके कुल्लो को आहिस्ता-आहिस्ता दबाना और सहलाना शुरू किया तो सुनीता की मादक आहें की आवाजे बेडरूम मे संगीत बनाने लगीं।
उसने वासना के वशीभूत होकर अपने चुचो को अपने ही हाथों से दबाना शुरू कर दिया.
मैंने पीछे से उसकी ब्रा के हुक खोल दिये और धीरे से उसके बडे चुचो को ब्रा की कैद से आज़ाद कर दिया।
अब तक उसके दोनों चुचों के बीच कत्थई रंग के चूचक तन कर खड़े हो गए थे, मानो दो कबूतर उड़ने को तैयार हों।
अब वो सिर्फ पैंटी में थी. वो एक हाथ से चूचों को छुपाने की कोशिश कर रही थी और दूसरे हाथ से चुतड की रक्षा कर रही थी।
मैंने उसके एक चूचे को मुँह में लेकर चूसना शुरू किया तो उसका शरीर एकदम मदमस्त सा करने लगा। वो मदहोशी की हालत में आँखों को बंद करके अपने दोनों हाथों से मेरे सिर को सहला रही थी.
फिर मैंने दूसरे चूचे को भी मुँह में ले लिया और अपने दोनों हाथों से उसके कुल्लो को दबाने लगा।
शायद वो काफी समय से प्यार से वंचित थी. अब वो कुछ हिंसक सी होने लगी थी. उसने मेरे होंठों को अपने होंठों में लेकर काफी देर तक चूसा।
अब उसे भी चूत चुदाई तृप्त करने लगी थी. वो शायद चुत चुदाई का साधन को ढूँढने लगी थी।
इसी बीच मैंने उसके हर खुले अंग पर अपने होंठों से स्पर्श किया.
फिर उसकी गुलाबी पैंटी को धीरे से नीचे खिसकाया तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया.
शायद अभी भी कुछ शर्म की बची हुई दीवार गिरनी बाकी थी.
मैंने अपने हाथ की ऊँगली उसके चूत के अन्दर रख दि और आहिस्ता से अन्दर बहार शुरू किया तो वो सिहर सी उठी सरररररथयहहहहहहहऔर मेरे बालों को कस कर पकड़ लिया.
इसी बीच मैंने उसकी चुत के। सामने नग्न हल्के काले बालों से ढकी हुई अत्यंत उभरी हुई सी चुत थी। भगवान ने उस रतिरूपा का हर अंग फुरसत से बनाया था.
उसकी चुत को देखकर कोई सोच भी नहीं सकता था कि वो कई वर्ष से शादी शुदा स्त्री है. उसकी चुत अभी भी कमसिन थी। शायद मेरे चचेरे भाई के लंड ने उसकी चुत की वह तृप्त थी वो नहीं दि थी जिसकी वो चुत हकदार थी.
मैंने एक हाथ से उसकी चूत को स्पर्श किया और उंगली से उसके चुत पर दस्तक दी.
एक उंगली से योनि की दोनों दरारों को खोला तो उंगलियों में कुछ चिपचिपाहट सी महसूस हुई. शायद वो चुतरस था।
कब मेरे होंठ उसके चुत से चिपक गए पता ही नहीं चला. मेरी इस हरकत ने उसे बेड पर लेटने को मजबूर कर दिया और वो दोनों टांगें खोल कर लेट गयी.
मुझे उसकी चुत की खुशबू मदहोश कर रही थी.
मैंने धीरे-धीरे उसका सारा चुत रस चाट लिया। जैसे ही मेरी जीभ चुत के अन्दर जाती तो उसके कुल्ले उठ जाते थे।
मैंने देखा कि चुत के नीचे एक छोटा सा छेंद जो इस क्रिया में हल्का सा खुल जाता था.
योनिरस से भीगी हुई उंगली मैंने उस छेंद में डाली तो सुनीता का शरीर अकड़ सा गया.
शायद ये उस छेंद में पहला प्रवेश था।
उसकी माँसल जाँघें, समतल पेट, गहरी नाभि, रसभरे चुचे, मादक और माँसल कुल्ले किसी को भी पागल बना सकते थे।
अब शायद सुनीता भी सरम की रेखा पार कर चुकी थी. उसने मुझे देखा और मुस्कराकर बोली अब चुत चुदाई तृप्त पुरी करो । अब युद्ध का आरम्भ होना था.
मैंने स्वयं पर नियंत्रण किया और उसकी चुत को फिर से मुखमैथुन का सुख दिया.
अब वो चरम पर थी.
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मैंने अपने लंड को उसकी चुत पर रखा तो सुनीता मचल सी उठी।
जैसे-जैसे लंड उसके चुत के अंदर जा रहा था, उसकी सिसकारियों की आवाज मादक होती जा रही थी।
पूरा लंड चुत में जाते ही उसने एक मादक आहहहहहह ईईईईईईई मर गई और मुझे एहसास हुआ कि उसकी चुत न जाने कितने दिनों से अनछुई थी।
लंड जैसे ही चुत की दीवारों से टकराया उसने मुझे कसकर अपनी छाती से चिपका लिया और मैंने उसके रसभरे चूचो को चूसना शुरू कर दिया। अब वो गांड को उठा-उठाकर मेरे लंड को घर्षण दे रही थी।
बीच में दो बार वो ढीली पड़ी लेकिन फिर से उसी गति से साथ देने लगी। आज शायद वो मुझे अपनी चुत में समा लेना चाहती थी. फिर मैंने उसे ऊपर आने को बोला.
उसने मुझे नीचे लिटाया और अपने हाथों से लंड को चुत में प्रवेश करवाकर मेरे ऊपर उछलने लगी. वो जिस गति से उछल रही थी उसके चुचे भी उसी गति से उछल कर मुझे पागल बना रहे थे।
मैंने दोनों हाथों से उसके कुल्लो को दबाना शुरू किया। अब हम दोनों स्खलन की ओर बढ़ रहे थे. मानो बेड पर सच में युद्ध चल रहा हो। उसका हर झटका लंड को उसकी योनि की दीवारों से टकराता था.
शायद उसे इसमें बहुत आनंद आ रहा था। अचानक उसने धक्कों की गति बढ़ा दी और मैंने भी उसके चुचो को कसकर पकड़ लिया।
हम दोनों के मुंह से आह-आह की कामुक आवाजें निकल रही थीं।
अचानक वो धड़ाम से मेरे सीने पर आ गिरी और बोली- हो गया!
मैंने भी उसी समय उसके कुल्लो को कसकर पकड़ते हुए चुत को लंड पर दबाया और सारा वीर्य उसकी चुत की गहराई में छोड़ दिया।
मेरी जांघों पर उसकी चुत से निकला हुआ चुतरस और वीर्य का मिश्रण बह रहा था।
हम दोनों ने एक दूसरे को देखा. दोनों की आँख में संतुष्टि और थकान दिख रही थी।
मैंने उसकी आँखों में देखा जिसमें फिर से एक चुदाई की चुनौती थी। शायद आज वो वर्षों की प्यास बुझाना चाहती थी और मैं भी बरसना चाहता था। हमारी इस चुदाई की प्यास और बरसात का आनंद आप अब कहानी के अगले भाग में लेंगे.
मजे से लंड खड़ा करके भाभी की चुदाई की कहानी का मजा लेना है.
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आपका (ग्रूप सेक्स स्टोरीज )
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लेखक खेमचनद टाॅक ✍✍








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